बेटियां

Bhupendra Rawat

रचनाकार- Bhupendra Rawat

विधा- कविता

देखो जन्म लिया जब मैंने
सबसे में अंजान थी।

लड़के की चाह में जन्मी इस जग मे
मैं बढ़ी मुश्किल से,
दुनिया तब बढ़ी हैरान और परेशान थी।
लुप्त हो गयी सबकी चेहरों की मुस्कान थी।

धीरे धीरे बढ़ी हुई,में भी
कई रिश्तों माँ,बहन,पत्नी
से पहचान थी

अवसर के अभाव,हमारे लिए इस जग में
पंक्षी की भांति रखते हैं, पिंजरे में।
अगर,अवसर मिले हमें भी जब जब,
तब तब सफलता ही परिणाम थी।

आज़ादी की लड़ाई में रानी लक्ष्मी की
भी एक तलवार थी।
ऐवरेस्ट की चोटी पर खड़ी
बछेंद्री पाल थी।
हवा में हमने भी भरी उड़ान थी।

इस जग में रोशन नाम किया जब मैंने
हर जबाँ पर नाम , मे ही जग और घर घर की पहचान थी।

संस्कारो को जीवित करने,
उन्हें निभाने का एक में ही नाम थी।

लड़की के जन्म पर ख़लिश चहरों
पर मेरे कारण ही मुस्कान थी।

नसीब हो जिनका उनके घर ही जन्म लेती है, बेटियां
अपनी एक मुस्कान से सबका दिल खुश कर दे जो
वैसा ही एक उपहार होती है बेटियां।
गुलिस्ता का चुनिंदा गुलाब होती है,बेटियां

लक्ष्मी,इन्दिरा, किरण और सायना जैसी मिसाल होती है,बेटियां

भूपेंद्र रावत

Sponsored
Views 549
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
Bhupendra Rawat
Posts 114
Total Views 5.8k
M.a, B.ed शौकीन- लिखना, पढ़ना हर्फ़ों से खेलने की आदत हो गयी है पन्नो को जज़बातों की स्याही से रँगने की अब बगावत हो गईं है ।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia