बेटियां

रजनी मलिक

रचनाकार- रजनी मलिक

विधा- लघु कथा

"पुनीत जी आपकी बेटी बहुत प्रतिभावान है ,उसे अच्छे से अच्छे कॉलेज में बार बार कह रही थी। आज मेरी बेटी नेहा बारहवी की परीक्षा में पूरे जिले में पहले स्थान पर आई थी।
मगर मेरा मन दूसरी ही उलझन मे था।"दो बेटे और है मेरे ,मुझे उनकी पढाई पर भी ध्यान देना है,घर पर जो लोन चल रहा है उसकी भी किश्ते देनी होती है। आखिर मेरे बेटे ही बुढ़ापे में मेरा सहारा होंगे,नेहा की शादी करनी होगी। उसके लिए भी पैसे जुटाने है।"
ये सब सोचते सोचते मै घर पंहुचा। नेहा मुस्कुराती हुई पास आई और बगल में बैठ गयी।उसकी आँखों में एक बड़प्पन था।वो कहने लगी
—"पापा,मै जानती हूँ मैम ने आप से शायद ये ही कहाँ होगा -क़ि आप मुझे आगे और अच्छे कॉलेज में पढाये ,मगर मै जानती हूँ,हमारे घर के हालात ऐसे नहीं है की मेरी पढाई आगे भी रेगुलर की जा सके ।भैया को भी पढाना है आगे। आप परेशां मत होना,मै घर रहकर ही आगे पढूंगी।
कोई बात नहीं ,मेरे दोनों भाई भी खूब पढ़े ,मै भी तो यही चाहती हूँ।"
ये कहते हुए उसकी आखें नम थी।मगर मै खुद को नहीं रोक सका ।
नेहा को गले लगाते हुए ,मेरा गला रुंध गया और आँखों से आसूं फूट पड़े।
मन में बार बार बस यही शब्द गूंज रहे थे-" शायद इसीलिए बेटियां घर की लक्ष्मी होती है"!
और मैंने फैसला किया की मेरी बेटी भी आगे अपनी पढाई पूरी करेगी।
#रजनी

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रजनी मलिक
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योग्यता-M.sc (maths) संगीत;लेखन, साहित्य में विशेष रूचि "मुझे उन शब्दों की तलाश है;जो सिर्फ मेरे हो।"

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