* बेटियाँ *

maheshjain jyoti

रचनाकार- maheshjain jyoti

विधा- कविता

बेटियाँ तो हैं कली सी डाल से इनको न तोड़ ।
हैं बहुत नाजुक सभी ये भावनायें मत मरोड़ ।।
सृष्टि की आधार हैं ये वासना को दे बिसार ।
मात्र पाना चाहती हैं ये सभी का बस दुलार ।।1

दो कुलों की शान हैं ये बाप- माँ की हैं गुमान ।
ये निभातीं बात अपनी तोड़ती ये हैं न आन ।।
हैं सभी लक्ष्मी स्वरूपा राधिका सीता समान ।
अंश हैं ये मात की रे हैं धरा सी धैर्यवान ।।2

फागुनी सी ये बहारें श्रावणी सी हैं फुहार ।
वासना के तीर पर करते चुनरिया तार-तार ।।
देख कर के आह निकले पर सभी हैं आज मौन ।
मान इनका जो बढ़ाये है बताओ कृष्ण कौन ?

-महेश जैन 'ज्योति',
मथुरा ।
(सभी रचनाएँ शुद्ध गीता छंद में )
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maheshjain jyoti
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"जीवन जैसे ज्योति जले " के भाव को मन में बसाये एक बंजारा सा हूँ जो सत्य की खोज में चला जा रहा है अपने लक्ष्य की ओर , गीत गाते हुए, कविता कहते और छंद की उपासना करते हुए । कविता मेरा जीवन है, गीत मेरी साँसें और छंद मेरी आत्मा । -'ज्योति'

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