बेटियाँ

urmila shukl

रचनाकार- urmila shukl

विधा- कविता

बेटियाँ

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जिस घर में

जन्म लेती हैं बेटियाँ

वो घर गमक उठता है

उनके सुवास से

रजनी गंधा ,मौलश्री

मधुमालती ,मोंगरा से भी

गहरी होती है

उनके प्रेम की सुवास।

रंगोली और अल्पनाओं से

सजाकर घर

बेरंग जीवन में वे

भर देती हैं

रँग जीवन के।

बुलबुल सी चहकती बेटियाँ

सूने घर को बना देती हैं

उपवन

सच ही कहती थीं दादी

जिस आँगन में

खेलती नहीं बेटियाँ

जिस आँगन से

उठती नहीं डोली

वो अँगना भी रह जाता है

अन बियाहा और अकेला

सचमुच बेटी के साथ साथ

मां बाबा ,घर द्वार ,

ताल तलैया सब

सबके सब

बंध जाते है

इक बंधन में।

कहीं टूट न जाये

नेह डोर

इस डर से घबराकर वे

नित नई गॉंठ

लगाती हैं

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urmila shukl
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kavita sngrh- ekkisvin sadi ke dwar par, kahani sangrh- apne apne morche par, main fulmati or hijade samiksha- hindi kahani men chhttisgdhi snskriti, chhttisgrhi lok geeton men stri aakashwani, durdrdhn, part patrikaon men rachnayen prkashit

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