बेटियाँ ——

Manchan Kumari मंचन कुमारी

रचनाकार- Manchan Kumari मंचन कुमारी

विधा- कविता

है बोझ नहीं ये जान लो तू ,
दुनिया वाले ये मान लो तू।
मिलता है कभी जो उसे मौका,
तो लगाती है वो भी चौका छका ।
तु दो तो मुझे बस एक मौका,
दुश्मन का छुड़ा दूँगी छका।
अब फर्क नही बेटी बेटा,
वो चीज चाहे कोई होता।
माना कुछ बेटी गलत भी है,
तो क्या सब बेटे सही है ।
बेटे-बेटी मे फर्क करना,
थी रीत बनाई पुरानी दुनिया ।
अब वैसी कोई बात नही,
वो पहले वाली बात नही ।
छू रही आसमाँ अब बेटी,
कुछ के आँखो कि चाँद बेटी ।
बस थोड़ा डर है बसा अभी,
घर से निकलती वो कभी-कभी।
डर लगता है चुभती नजरो का,
डर लगता है समाजों का ।
तेरी भी कोई बहन होगी,
माँ, पत्नी और बेटी होगी ।
जब घूरते हो गैरों को ऐसे,
क्या वो भी झेलते होंगे ऐसे ।
चाहे वो कोई आम लड़की,
या करती हो वो नाम लड़की।
है बोझ नहीं ये जान लो तू ,
दुनिया वाले ये मान लो तू।

—— मंचन कुमारी (Shandilya Manchan) 19/01/2017

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Manchan Kumari मंचन कुमारी
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Student समस्तीपुर कालेज , समस्तीपुर ! हिन्दी एवं अंग्रेजी मे लिखना पसंद है, .....कुछ अच्छा लिखना मेरा सपना है । ( लिखना तो बस आदत ही नही, कुछ भी लिख दूँ ऐसी चाहत ही नही , मन बोले शब्दों को तौलें , दिल की बाते भी ये इबादत ही नही । ……….मंचन .)
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