बेटियाँ

Dr Purnima Rai

रचनाकार- Dr Purnima Rai

विधा- कविता

बेटी को जन्म देकर भी माँ
माँ ही रहती है
बेटी के जन्म पर अक्सर
माँ की रुस्वाई होती है।

एक बेटी क्या कम थी
जो दूसरी को पैदा किया
सुन कर ताने लोगों के
माँ की जग हँसाई होती है।

मार देती कोख में
किसी को क्या पता चलता
गर्दिश-ए-पुरुष अदालत में
माँ की रूलाई होती है।

धैर्य ,संयम, साहस से
बेटी का पालन किया
बड़ी होकर वही बेटी
माँ की पराई होती है।

बेटे नहीं बेटियाँ भी
करती है रोशन चिराग
बेटे के रूठने पर वही
माँ की सहाई होती है।

अहमियत कम न समझो
वे भी हैं बेटों से बढ़कर
"पूर्णिमा "जहाँ न हो बेटियाँ
वहाँ माँ की तन्हाई होती है ।

डॉ०पूर्णिमा राय,
शिक्षिका एवं लेखिका
अमृतसर(पंजाब)

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Dr Purnima Rai
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मैं मूलत:एक शिक्षिका हूँ।लेखिका ,संपादिका ,समीक्षक भूमिका निभाकर साहित्य सृजन की ओर अग्रसर हूँ मेरी स्पर्धा किसी से नहीं , स्वत:अपने आपसे है।स्वयं को बेहतर से बेहतरीन बनाना मेरे साहित्यिक जीवन का लक्ष्य है।.. शब्द अथाह सागर हैं और भाव उठती हुई लहरें.. ..डॉ.पूर्णिमा राय ,अमृतसर(पंजाब)

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