*बेटियाँ*

Dharmender Arora Musafir

रचनाकार- Dharmender Arora Musafir

विधा- गज़ल/गीतिका

2122 2122 2122 212
थम गयी साँसें सभी जबसे पढ़ा अख़बार है !
अब भगत-आजाद की इस देश को दरकार है!
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दे रही आँखें गवाही अब हमारी पीर की!
जग गयी यादें सभी अंतर चले तलवार है !!
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लेखनी का वर मिला फ़िर भी रही खामोश थी !
हो रहा जो देश में सब कौन जिम्मेदार है !!
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डस लिया नाजुक कली को इक विषैले नाग ने !
वो दरिंदा घूमता फिर मौन क्यों सरकार है!!
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आज वहशी मार देते बच्चियों को जान से!
राज़ सारा खुल गया अब सो चुका करतार है !!
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जाने' कितने मैडलों को मार डाला कोख में !
मानसिकता देश की अपने बहुत बीमार है !!
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कम न समझो बेटियों को छू रही अब ये गगन !
सिंधु साक्षी से हुआ इस देश का उद्धार है !!
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*धर्मेन्द्र अरोड़ा*

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One comment
  1. बेहद
    उम्दा
    बधाई एक सार्थक रचना के लिए