बेटियाँ

रजनी रंजन

रचनाकार- रजनी रंजन

विधा- कविता

अर्धनारीश्वर  के सृजन में बेटियाँ
सहभागी औ सहगामी जीवनपथ में बेटियाँ ।
धरती  और आकाश तक
या फिर पाताल तक
हैं गूढ अर्थ में बेटियाँ
हैं नूर देश में बेटियाँ
हरकदम हमदम है, हर कण में बेटियाँ ।
पर बिन पर उड़ पाए कैसे
पर काट रहे हैं जग जिनके
कुछ बहके कदम से पथ भटकी
फॅस गयी काल के  क्रूर चक्र में
फिर   ग्रह  पूर्वाग्रह से  मिलकर
दुर्भाग्य बन गयी बेटियाँ ।
रचती जिनसे दुनिया अपनी
जग को करना होगा स्वीकार
नर- नारी  सम संसार में
हर क्षेत्र में है इनका भी अधिकार
हर दुःख  सहकर भी सिद्ध करेगी
हर अर्थ को बेटियाँ ।
पायल की रूनझुन बेटियाँ ।
हर ओर कदम हैं  डाल रही
अपनी पहचान बना रही
मत अबला कह उनको ए जग
अब अंतरिक्ष तक पाओगे
गर बेटी नहीं रहे तो तुम
धरती पर कैसे  आओगे
सहस्ररूपा हैं  बेटियाँ
दिग् दिगन्त में बेटियाँ ।

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