बेटियाँ

विजय कुमार अग्रवाल

रचनाकार- विजय कुमार अग्रवाल

विधा- कविता

खुशियाँ नहीँ मनाई जाती , क्यों बेटी जब जन्म है लेती ।
हर घर को खुशियोंकाखजाना ,जबकि अधिकतर बेटी देती ॥
ज्यों ज्यों बेटी बढ़ती जाती ,माँ की जिम्मेदारी लेती ।
हरेक पिता की लाडली बेटी ,पिता के दिल की धड़कन होती ॥
फ़िर भी ऐसा क्यों होता है , जनम पे उसके घर रोता है ।
मात पिता को बोझ बताये , उस बेटे पर घर खुश होता है ॥
क्यों बेटी के त्याग का जज़बा ,इस समाज को समझ ना आता ।
क्यों समाज घर की बेटी को ,इस धरती पर बोझ बताता ॥
घर घर में महिला ही केवल ,बेटी की दुश्मन होती है ।
कब समझेगी घर की दादी ,वो भी कभी बेटी होती है ॥

विजय बिज़नोरी

Views 227
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
विजय कुमार अग्रवाल
Posts 31
Total Views 1.3k
मै पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बिजनौर शहर का निवासी हूँ ।अौर आजकल भारतीय खेल प्राधिकरण के पश्चिमी केन्द्र गांधीनगर में कार्यरत हूँ ।पढ़ना मेरा शौक है और अब लिखना एक प्रयास है ।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia