बेटियाँ

Kaushal Meena

रचनाकार- Kaushal Meena

विधा- कविता

एक बार घटित हुआ वो किस्सा
फिर उसने शोर मचाया सबको जगाया
जग जग मै चर्चित होकर थम सा गया
ये किस्सा था बेटियों के जन्म मै मरण का

जमाना आगे निकल गया
अब सब कुछ बदल सा गया
फिर भी क्या आम था इस समाज मै
प्रतिशत कन्या का सब कह गया

सामाजिक क्रूरताओ का बोझ
उसके कंधों पर ही क्यू टिका है
क्या कन्या औरत के बेस मै
चलता फिरता कोई नगीना है
जो चमकने से दुष्कर्म पीड़ा
आदि की मोहताज है

क्या कुछ नहीं सहती वो
कन्या जींदा दिल तबीयत मै बेठी
मुर्दा दिल हैवान है वो
वो कैसे अपने गम बोले
सहती पीड़ा के राज खोले
हक भी तो नहीं है उसे
सिवाय रोटी-चूल्हा-चोंकी के

बेटियों पे अत्याचार
रिवाज भी तो है पुराना
परम्पराओ को बनाये रखना
मानव जाती का प्रमुख हिस्सा

फिर कैसे पाओगे बेटा जब
कन्याओ को ही मरवाओगे
एक माँ का प्यार समझ सको तो
समझ लेना बेटियाँ उनकी दूसरी छायां

आओ मिल कर आज ये शपत ले
बेटियाँ बेटों के है समान समझ ले
हर सुख हर आजादी उनके हिस्से का
तोड़ के सामाजिक जंजीरे बोल दे
बेटी है तो कल है
बेटी है तो जीवन है

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Kaushal Meena
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कौशल मीणा जयपुर राजस्थान मै एक कॉलेज स्टूडेंट हु , राजस्थान यूनिवर्सिटी कॉमर्स कॉलेज जयपुर एक पन्ना किताब का ही मान ले तो एहसान होगा , किताब मै लिखना बेहतर अंदाज – ए -बयाँ लगता है मुझे

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