बेटियाँ

सोनू हंस

रचनाकार- सोनू हंस

विधा- कविता

बेटियों को मारकर क्यूँ लिखते हो खून से तकदीर अपनी,
देखना ये बेटियाँ ही एक दिन तेरे काम आएँगी।
जब कोई बेटा तेरा दुत्कार कर घर से निकाल देगा,
देने तुझे सहारा कोई ये बेटियाँ ही आगे आएँगी।
क्यूँ कुचलता है पेट में ही फूल जो खिला नहीं,
क्यूँ रूष्ट हुआ उससे जिससे अभी मिला नहीं,
मूर्ख इस बेटी की किलकारियाँ ही तेरे घर को महकाएँगी।
देने तुझे सहारा कोई ये बेटियाँ ही आगे आएँगी।
जिस नन्हीं कली को तू अरे सर का भार समझता है,
क्यूँ नहीं उसे तू घर का आधार समझता है।
घर की तेरे सभी औरतें क्या किसी की बेटिया नहीं कहाएँगी।
देने तुझे सहारा कोई ये बेटियाँ ही आगे आएँगी।
बेटा सहारा गर तेरा तो बेटियाँ तेरी मुस्कान हैं,
बेटा शरीर है तेरा तो बेटियाँ भी तेरी जान हैं।
शरीर का अस्तित्व ही क्या गर जान निकल जाएगी।
देने तुझे सहारा कोई ये बेटियाँ ही आगे आएँगी।
समझ जा अभी भी समय है बेटियों से यूँ मुँह न मोड़,
बेटियों को किसी कूड़े के ढेर पर मूर्ख यूँ न छोड़।
हुई अगर न संसार में बेटियाँ तो वंश बेल न बढ़ पाएँगी।
देने तुझे सहारा कोई ये बेटियाँ ही आगे आएँगी।
सोनू हंस

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