बेटियाँ देश की

अजय '' बनारसी ''

रचनाकार- अजय '' बनारसी ''

विधा- कविता

मिला कंधे से कंधा
कुंठित धारणाओ को तोड़
कंटक भरे राह को कर सुगम
बड़ी लड़ाई लड़ लड़कर
विश्व में परचम लहरा रही है
बेटियाँ देश की
माँ , बहन , पत्नी
मैत्रेयी , गार्गी और दुर्गा
सिन्धु, साक्षी,किरण बेदी
महादेवी और मनु भंडारी
हर रूप में आगे है
बेटियाँ देश की
जब जन्म बेटी का
घर में होता है
न जाने क्यों आज भी
उत्सव नहीं होता है
आदिकाल से आजतक
हमे राह दिखा रही है
बेटियाँ देश की

शक्ति को भूल हम
कैसे बेटे के लिए ललक रहे
भूल रहे सृजन हमारा भी
यदि बेटी न हो तो शून्य रहे
मनुष्य के भ्रूण से जीव होने का दर्शन
मूक भाषा में हमे समझा रही है
बेटियाँ देश की

कभी उलझन में हो पिता
बाहरी कामकाज से हो थका
चेहरे पर सिर्फ मुस्कान से
पल भर में हँसी लाती है
भूल उपेक्षाए बेटी के होने से
पिता के दुखो के लिए अक्सर
ममता का कंधा बन जाती है
बेटियाँ देश की

प्रण ले हम सब आज यहाँ
उत्सव बेटी के होने से भी होगा
बेटा चिता को अग्नि दे सकता है
तो यह हक़ बेटियों को भी होगा
नहीं कोई डर तर्पण का दिल में रखना होगा
मानते थे कल हम माँ दुर्गा देवी स्वरुप बेटी को
आज फिर से हमे सबकुछ समर्पण करना होगा
नहीं मुझे थोड़ी भी चिंता लोग क्या कहेंगे
कंधे पर बेटी के जाऊंगा,
शब्द मेरे हो जन जन तक परिभाषित
मै एक ऐसा अलख जगाऊंगा
क्योंकि
मेरा आदर और सम्मान, देश का गौरव है
बेटियाँ देश की

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अजय '' बनारसी ''
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अजयप्रकाश सा. शुक्ला , निवास : मुंबई , महाराष्ट्र पैत्रिक निवास : भदोही , उ. प्र. शिक्षा : डिप्लोमा सिविल इंजीनियरिंग रूचि : समाज सेवा , कविता लेखन

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