*”बेचैन इंसान और विवेक”*

Mahender Singh

रचनाकार- Mahender Singh

विधा- कविता

**इंसान तेरी बेचैनी की वजह क्या है ?
कुछ खो गया है या व्यर्थ ही परेशान है !

नींव ही कमजोर है जो बनते हिलने लगी,
जानकारी झूठी है जो बीच भंवर फंस गई,

चक्रवृर्द्धी ब्याज लग गया जो उतर न सका,
या धोखा हुआ व्यवहार खराब था जो कि फंस गया,

प्रेम नहीं वासना में पालन हुआ ,
जो जगा सका न विवेक,असहाय बन गया,

या झूठी आस्तिकता में फंस जीवन जीया,
जो निजता की खोज के बिना जीवन-भर बेचैन जी रहा,

स्वार्थ छोड़ स्वावलंबी बन जरा,
व्यर्थ को पहचान
समर्थ की ओर ध्यान लगा जरा,
विवेक जगे,
दीप जले,घर घर हो उजियारा,
यही डॉ महेन्द्र सिंह खालेटिया,
तेरा अध्यात्मिक नारा है,
स्वतः मिट जाएगा जो पाखंड है,
अंधभक्ति,अंधविश्वास, अंध-व्यवस्था को जगह नहीं…. गर बन जीए समर्थवान् भला

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Mahender Singh
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पेशे से चिकित्सक,B.A.M.S(आयुर्वेदाचार्य)

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