बीती यादों के बसेरे

Ranjana Mathur

रचनाकार- Ranjana Mathur

विधा- गज़ल/गीतिका

तन्हा रातों में बिसरी यादों को
आवाज दे बुला रहा हूँ मैं।
जुबां तो हो चुकी खामोश
सदा दिल की सुना रहा हूँ मैं।
दवा तो हो चुकी बेअसर कभी की
दुआओं के मरहम लगा रहा हूँ मैं।
तूफानी रात में देखो दीए की
लौ जला बुझा रहा हूँ मैं।
गलतियां की कदम दर कदम मैंने
खामियाजा आज उठा रहा हूँ मैं।
अब तो आलम ये हैरानगी का
कि बंद आँखों में ही कदम बढ़ा रहा हूँ मैं।
सुन कर इक आह मेरी
देखा जो किसी ने मुड़कर
अपनी इसी बानगी पे तो
बहुत मुस्कुरा रहा हूँ मैं।

—रंजना माथुर दिनांक 10/08/2017 (मेरी स्व रचित व मौलिक रचना)
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Ranjana Mathur
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भारत संचार निगम लिमिटेड से रिटायर्ड ओ एस। वर्तमान में अजमेर में निवास। प्रारंभ से ही सर्व प्रिय शौक - लेखन कार्य। पूर्व में "नई दुनिया" एवं "राजस्थान पत्रिका "समाचार-पत्रों व " सरिता" में रचनाएँ प्रकाशित। जयपुर के पाक्षिक पत्र "कायस्थ टुडे" एवं फेसबुक ग्रुप्स "विश्व हिंदी संस्थान कनाडा" एवं "प्रयास" में अनवरत लेखन कार्य। लघु कथा, कहानी, कविता, लेख, दोहे, गज़ल, वर्ण पिरामिड, हाइकू लेखन। "माँ शारदे की असीम अनुकम्पा से मेरे अंतर्मन में उठने वाले उदगारों की परिणति हैं मेरी ये कृतियाँ।" जय वीणा पाणि माता!!!

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