बिरले ही बनते यहाँ , तुलसी सूर कबीर

Dr Archana Gupta

रचनाकार- Dr Archana Gupta

विधा- दोहे

1
घिस घिस कर पाषाण पर, हिना बिखेरे रंग
तभी चमकते हम यहाँ,सहें कष्ट जब अंग
2
तुलसी साधू हो गये, मोह गया जब टूट ।
सियाराम से हो गया, उनका नेह अटूट
3
गिर जाते जो पेड़ से , जुड़े नहीं ज्यूँ पात
बात बिगड़ने पर नहीं , आती फिरं वो बात
4
धोकर कलुषित भाव सब, बनो नेक इंसान
सीख यही देता हमें , पावन गंगा स्नान
5
फँसकर माया मोह में ,क्यों बदली है चाल
धरा यहीं रह जाएगा ,जब आयेगा काल
6
ख्याति और आलोचना , रहतीं हरदम साथ
कहीं किसी भी मोड़ पर ,नहीं छोड़तीं हाथ
7
लेखन है इक साधना,नहीं हवा में तीर
बिरले ही बनते यहाँ , तुलसी सूर कबीर

डॉ अर्चना गुप्ताह

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Dr Archana Gupta
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Co-Founder and President, Sahityapedia.com जन्मतिथि- 15 जून शिक्षा- एम एस सी (भौतिक शास्त्र), एम एड (गोल्ड मेडलिस्ट), पी एचडी संप्रति- प्रकाशित कृतियाँ- साझा संकलन गीतिकालोक, अधूरा मुक्तक(काव्य संकलन), विहग प्रीति के (साझा मुक्तक संग्रह), काव्योदय (ग़ज़ल संग्रह)प्रथम एवं द्वितीय प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

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