बाल गणेश लीला (हास्य)

guru saxena

रचनाकार- guru saxena

विधा- घनाक्षरी

बाल गणेश लीला(हास्य)

बालक गणेश बोले माता तुम कहती हो
पिताजी का देवों में श्रेष्ठ स्थान है
सबको सपरिवार खाने पै बुलाते लोग
हंसी खुशी उत्सव का बनता विधान है
साथी बतलाते हैं तो शर्म लगती है मुझे
यही सोच सोच तेरा पुत्र परेशान है
परिवार सहित पिता को ना बुलाते कोई
कैसे मानूं देवों में हमारा बड़ा मान है।

पता नहीं कैसे-कैसे साथियों में खेलता है
यहां-वहां की बातों में सर ना खपाया कर
हम को सपरिवार क्यों नहीं बुलाते लोग
पिताजी का मान पान बीच में न लाया कर
पहले स्वयं की खुराक का हिसाब लगा
भोजन से रोज-रोज मां को ना सताया कर।
दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है पेट तेरा
बार-बार कहती हूं बेटा कम खाया कर।

कितनी भोली हो माते मेरा मूल प्रश्न छोड़
चाहती हो ध्यान को बटाना अफसोस है।
परिवार सहित पिता को ना बुलाए कोई
इसमें बताओ मेरे पेट का क्या दोष है।
मित्र मंडली को ले पिताजी कब कहां गए?
पूछते हैं साथी मुझे आता बड़ा जोश है।
नहीं बतलाती माता मुझसे छिपातीं बोलो
हमें न बुलाने का कारण कोई ठोस है।

सुरों की समाज में हमारा मान पान बढ़ा
दूर से प्रणाम के सुमन झरते हैं सब।
पिता जी के पांच मुख छै मुख का बड़ा भाई
तेरा मुख हाथी का ये जान डरते हैं सब।
पूरे जग का खाना अकेले हम खा ना जाएं
परिवार देख हा हा सांसे भरते हैं सब।
गंगा खाए चंदा खाए सांप खाए नंदी खाए
आमंत्रित हमें इसी से ना करते हैं सब।।

गुरु सक्सेना नरसिंहपुर मध्य प्रदेश

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