“बाबुल का आंगन”

Prashant Sharma

रचनाकार- Prashant Sharma

विधा- कविता

बाबुल का आंगन लगे ,प्यारा जहां बीता बचपन सारा।
याद आती मेरे मन में ,वह बात दिन रात है।
अंगना दौड़े आंखें मीचे ,माता आती मेरे पीछे।
बाबुल बोले खेलो बेटी ,बता क्या बात है।

आंगन बाबुल का सजाती ,शादी गुड़िया की रचाती।
सुनहरे सपने में खो जाती , होती मन से मन की प्यारी एक बात है।
की जब होगी मेरी शादी, छिन जावेगी आजादी।
कैसे होंगे मेरे साजन ,मन आती यही बात है।

भाई से नित नित लड़ना ,तनक मैं तुनकना।
बाबुल कहे बेटी क्यों रुठी, क्या बात है।
शिकायत पल-पल करना ,रोज सबको तंग करना।
बाबुल के आंगन की ,निराली यही बात है।

मन मार के सो जाती ,जाने सुबह कब हो जाती।
बाबुल के आंगन का ,ऐसा होता दुलार है।
मैं रानी मन की होती, दादी कहती सियानी पोती।
बिना बाबुल आंगन लगे सब बेकार है।

प्रशांत शर्मा "सरल"
नरसिंहपुर

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Prashant Sharma
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