बात समझ मे आई

अल्पना नागर

रचनाकार- अल्पना नागर

विधा- लघु कथा

लघु कहानी

बात समझ में आयी

आज रजिया बहुत खुश नज़र आ रही थी।कक्षा 12 में उसने गणित विषय में सर्वाधिक अंक प्राप्त किये।सभी शिक्षकों व मित्रों नें उसे बधाई दी व उज्जवल भविष्य की कामना की।आज वो शीघ्रातिशीघ्र घर पहुँचकर अपनी अम्मी को ये ख़बर सुनाना चाहती थी।ट्यूशन से निपटकर उसने अपने कदमों की रफ़्तार तेज कर दी।पर रास्ते में एक दुकान को देख उसके क़दम स्वतः रुक गये।बाहर शीशे से झांकते जूतों को वो हमेशा हसरत भरी नज़रों से देखती। आज महीने का अंतिम दिन था, ट्यूशन से मिली कमाई से उसने अपनी अम्मी के लिये जूते खरीदने की ठानी।
"कितनी मेहनत करती है अम्मी दिनभर…कड़ाके की ठंड में उनके पाँव ठिठुरते हैं लेकिन क्या मजाल जो एक बार भी शिकायत कर दे! पाँव बुरी तरह फट चुके हैं,आज चाहे कुछ भी हो मैं जूते खरीदकर ही रहूंगी।"रजिया नें मन ही मन सोचा।
"रजिया तेरी तो किस्मत खुल गई बेटा" घर पहुँचते ही रजिया की खाला नें खुश होकर कहा।
"मैं समझी नहीं…क्या हुआ ?"
"अरे तू बस निकाह की तैयारियाँ शुरू कर दे।एक रिश्ता देखा है तेरे लिये।लड़का सऊदी अरब में काम करता है महीने के लाखों कमाता है।वो लोग जल्द से जल्द निकाह करना चाहते हैं।"
"तो हमारी रजिया सऊदी अरब जायेगी ?"रजिया की अम्मी नें पूछा।
"नहीं, लड़का साल या 2 साल में एक बार खुद आ जायेगा मिलने..।"खाला नें कहा।
"अम्मी मुझे अभी निकाह नहीं करना..मुझे इंजीनियर बनना है।"
""दिमाग ठीक है तेरा,इतना अच्छा रिश्ता ठुकरा रही है,तेरी अम्मी नें ही तुझे सर पे चढ़ा रखा है।"खाला नें चिढते हुऐ कहा।
"खाक अच्छा रिश्ता है इससे अच्छा तो ज़िंदगी भर निकाह ही ना करूँ,उस शौहर का क्या करना है जो सिर्फ़ औपचारिकता निभाने के लिये निकाह पढ़ेगा।मैंने अम्मी को इतने साल तक बेवा की तरह देखा है..किस तरह सिलाई करके हमें पाला पोसा पढाया लिखाया ये बात आप भी जानती हैं। अब्बू का प्यार क्या होता है हमें नहीं पता…हाँ कैंसर होने पर ज़िंदगी की बची खुची सांसे अब्बू नें घर आकर पूरी की थी..मुझे अच्छी तरह याद है अम्मी रात रात भर जगकर उनकी सेवा में लगी रहती थी।शादी जैसी संस्था सिर्फ़ नाम के लिये या समाज को दिखाने के लिये नहीं होती।माफ करना खाला जान मुझे ये रिश्ता कबूल नहीं..।"
"रजिया सही बोल रही है बाजी।मेरी दोनों बच्चियां कब बड़ी हो गई कुछ पता नहीं लगा।इन्हें अब्बू और अम्मी दोनों का प्यार मैंने ही दिया।मुझे खुशी इस बात की है कि मेरी अब तक की मेहनत रंग लाई,पढ़ लिखकर मेरी बच्चियों में इतनी समझ आ चुकी है कि वो अपना अच्छा और बुरा समझने लगी हैं,इन्हें और आगे उच्च शिक्षा दिलाउंगी,काबिल बनाऊंगी।"अम्मी नें गर्व से सर उठाकर कहा।
खाला अपना सा मुँह लेकर जा चुकी थी।उन्हें बात समझ आ चुकी थी।

अल्पना नागर ✏.

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अल्पना नागर
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मेरा नाम अल्पना नागर है।पेशे से शिक्षिका हूँ।मूलतः राजस्थान से हूँ, वर्तमान में दिल्ली में निवास है।पिछले 1 वर्ष से साहित्य सृजन में संलग्न हूँ।सभी तरह की कविताएं छंद मुक्त,छंद बद्ध, गीत,नवगीत,ग़ज़ल, गीतिका,हायकू,क्षणिकाएं लिखना व पढ़ना बहुत पसंद है।

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