बांच लो पाती नयन की…..

Tejvir Singh

रचनाकार- Tejvir Singh

विधा- कविता

बिन तुम्हारे जो गुजारी,
रैन 'बेचारी' विरहन की।
शब्द वर्णन को नहीं हैं,
बांच लो पाती नयन की।।

स्वांस का आवागमन भी,
जब दुरूह लगने लगे।
रंग सब बेरंग-केवल,
बोझ रूह लगने लगे।
मान लो पतझड़ अवस्था,
हो चुकी जैसे चमन की।
बांच लो पाती नयन की।।

पुष्प बिन खुशबू अधूरे,
बिन कली मधुकर फिरें।
आगमन 'मधुमास' हो,
झर-झरके झरने निर्झरें।
लौट आए पहले-सी ही,
सीरत मन-उपवन की।
बांच लो पाती नयन की।।

फिर मुझे पहले-सी ,
प्रीतम प्रीत देदो।
हार के सब वार दूँ,
वह जीत देदो।
फिर सदा बन के रहूँ,
दासी चरन की।
बांच लो पाती नयन की।।

मन-मगन मनुहार,
करता है समर्पण।
अब पिया-सब कुछ,
करूं तुझको मैं अर्पण।
मेरे हिरदे में महक,
भर दो सुमन की।
बांच लो पाती नयन की।।

हे पिया!सह-भाव,
अंगीकार कर लो।
अपनी वामांगी मुझे,
स्वीकार कर लो ।
हो रहूँ साक्षी सदा,
हिरदय-हवन की।
बांच लो पाती नयन की।।

आपके ही "तेज" से,
महके मेरा मन।
हो समर्पित आपको,
तन,मन-ओ जीवन।
एक-कर दूरी मिटा दो,
देह-तन की।
बांच लो पाती नयन की।।

रचना : तेजवीर सिंह 'तेज'

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