बाँसुरी

maheshjain jyoti

रचनाकार- maheshjain jyoti

विधा- घनाक्षरी

* बाँसुरी *
——–
ब्रजभाषा में छंद
————
जबहु निहारी कभी श्याम की सलौनी छवि ,
मन मेरौ श्याम की लुभाय गयी बाँसुरी ।
जब ते सुनीयै तान तन कौ रहे न ध्यान ,
मिसरी सी कानन घुराय गयी बाँसुरी ।
सोह रही ओठन पै प्यारे मनमोहना के ,
चुप मन बैरन चुराय गयी बाँसुरी ।
'ज्योति' कहै बाँसुरी की तान में बसी है जान,
राधे नाम श्याम की सुनाय गयी बाँसुरी ।।

ऐ री दादी ! पतरी सी बाँस की लकड़िया सी ,
कौन तोकूँ सुघड़ बनाय गयी बाँसुरी ?
छैंदन में तेरे जानै भेद कहा रोप दिये ,
कौन तोमैं औगुन भराय गयी बाँसुरी ?
काहे श्यामसुंदर के हाथन में परि गयी ,
कौन अधरन पै धराय गयी बाँसुरी ?
'ज्योति' कहै काहे तोमैं राधिका कौ नाम बसै ,
काहे श्याम इतनी सुहाय गयी बाँसुरी ?

महेश जैन 'ज्योति',
मथुरा ।
***

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maheshjain jyoti
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"जीवन जैसे ज्योति जले " के भाव को मन में बसाये एक बंजारा सा हूँ जो सत्य की खोज में चला जा रहा है अपने लक्ष्य की ओर , गीत गाते हुए, कविता कहते और छंद की उपासना करते हुए । कविता मेरा जीवन है, गीत मेरी साँसें और छंद मेरी आत्मा । -'ज्योति'

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