बह ए मुतदारिक़ मुसम्मन सालिम —जन्मदायिनी माँ

राजकिशोर मिश्र 'राज' प्रतापगढ़ी

रचनाकार- राजकिशोर मिश्र 'राज' प्रतापगढ़ी

विधा- गज़ल/गीतिका

मित्रों माँ जन्मदायिनी है लाल के सुख और दुख को समान भाव से लेती है सुख मे सुख,मे दुखमे दुख की अनुभूति करती है अगर लाल को कहीं कभी कोई दर्द होता है पहला शब्द माँ
होता है माँ ममता की सागर है माँ अतुलनीय है कभी -कभी कुदरत कैसा खेल रचना माँ हो जाती है किंकर्तव्यविमूढ़ दिल पर पत्थर रख करती है अपने वचन की रक्षा———– महाभारत पर्व से ————–
बह ए मुतदारिक़ मुसम्मन सालिम
========================
मापनी – २१२ २१२ २१२ २१२
माँ कही एक दिन लाल सुन लो ज़रा
ज्ञान मन मे भरो लाल गुन लो ज़रा
राज कहना नहीं तू कभी प्यार में
नारि को श्राप है लाल धुन लो ज़रा
पांडु नंदन दिए कर्ण के प्रेम मे
नारि कहना वचन , प्यार बुन लो जरा
मातु यह क्या किया पाप मुझसे हुए
बोल देती अगर , राज चुन लो ज़रा
जो दिए थे वचन , लाज रखने पड़े /
लाल खोना कठिन तार झुन लो ज़रा/-

Views 6
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
राजकिशोर मिश्र 'राज' प्रतापगढ़ी
Posts 17
Total Views 120
लेखन शौक शब्द की मणिका पिरो छंद, यति गति अलंकारित भावों से उदभित रसना का माधुर्य भाव मेरा परिचय है-

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia