बहुत खूबसूरत वो कमसिन हसीना

yaqub azam azam

रचनाकार- yaqub azam azam

विधा- गज़ल/गीतिका

बहुत खूबसूरत वो कमसिन हसीना
किया जिसने मुश्किल बहुत मेरा जीना
बहुत खूबसूरत वो कमसिन हसीना

किसी काम से जा रहा था मै बाहर
मिली वो मुझे रेल गाड़ी के अन्दर
किनारे अलग सबसे बैठी हुयी थी
ख्यालों में अपने वो उलझी हुयी थी
बदन था कि जैसे कोई संगमरमर
लपेटी थी उसने स्यह रंग चादर
बहुत खूबसूरत वो कमसिन हसीना बहुत खूबसूरत

तभी एक झोके ने कर दी शरारत
किया उसकी चादर ने रुख से बगावत
नज़रआ गया फूल सा उसका चेहरा
कि बदली मे हो जैसे सूरज सुनहरा
उठी शोख़ उसकी नज़र मेरी जानिब
हुई फिर वो लम्हों मे मुझसे मुख़ातिब
बहुत खूबसूरत वो कमसिन हसीना
बहुत खूबसूरत

दिया नर्म हाथों से कागज़ का टुकड़ा
कहा इसमे देखो लिखा है पता क्या
उतरना कहॉ है ज़रा ये बता दो
मुझे इस जगह का पता तो बता दो
बहुत खूबसूरत वो कमसिन हसीना
बहुत खूबसूरत

ये सुनते ही होने लगा मैं दिवाना
मै खुद भूल बैठा कहॉ तक है जाना
वो आवाज़ थी याकि पायल की छम छम
मेरे ज़ेह्न में भर दिया जिसने सरगम
कहॉ जाऊं किससे पता उसका पूंछू
बता ऐ मेरे दिल कहॉ उसको ढूंढूं

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