बहते काजल !

Satyendra kumar Upadhyay

रचनाकार- Satyendra kumar Upadhyay

विधा- कहानी

वह तो बस हुचुर-हुचुर ! रोये जा रही और ऑसूं थे जो सुन्दर-2 ऑखों में लगे काजल को साथ लिए जा रहे लाल हुए गालों की ओर बहते हुए काले किए जा रहे थे ! साॅसें कम और अश्रुधार ज्यादा ! सुधा जो आज भूल गयी थी काजल पोंछना वह भी स्कूल से घर पॅहुचने के पहले !
पिताजी द्वारा प्रतिदिन दिए दस पैसों को इकट्ठा कर तीन महीने के बाद अपनी बचपनी व प्राकृतिक श्रंगार की ओर रूझान जो हो चला था और सौतेली माॅ के डर से वह इसे अपनी सहेली के घर रखती व स्कूल जाते समय लगाती और घर पँहुचने के पहले पोंछ देती थी ।
लेकिन आज भूल गयी थी काजल मिटाना ! तो उसकी सौतेली माॅ ने उसकी छोटी सी दबी , डरी व सहमी सी एकमात्र इच्छा को भी उसके गालों को लाल करते हुए सदा के लिए ऑसुओं में बहा दिया था । पिताजी सबसुन सिर्फ चुप थे पर उनके ऑसूं तो बह जरूर रहे थे पर अंदर की ओर ।

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Satyendra kumar Upadhyay
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