बहकने की बात थी कुछ संभलने का इशारा था

suresh sangwan

रचनाकार- suresh sangwan

विधा- गज़ल/गीतिका

बहकने की बात थी कुछ संभलने का इशारा था
ज़रा खुल के बतलाओ क्या मतलब तुम्हारा था

मानिंद सूखे पत्ते के हम साथ हवा के हो लिये
लगा उन लम्हों में ज़िंदगी ने हमें पुकारा था

रास्ता खुदा जाने कब बदल लिया उसने
हम बैठे थे जहाँ वो तो नदिया का किनारा था

शमां तो जली है रोशनी की दरकार पे ए खुदा
किसी दिल के अंधेरों ने ख्वाब ये संवारा था

नज़रें तो थी मगर कहाँ उठाने की इजाज़त थी
कभी सोचा ही नहीं हमने क्या कुछ हमारा था

शौहर और बीवी की तक़रार सदा चलती रही
शादी हुई थी जिस्मों की दिल मगर कंवारा था

हँसने की बातें तो दूर की बातें हैं ए 'सरु'
मर्ज़ी से रोना भी कहाँ ज़माने को गवारा था

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suresh sangwan
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