बस धता दिखला रहे….

सतीश तिवारी 'सरस'

रचनाकार- सतीश तिवारी 'सरस'

विधा- गज़ल/गीतिका

कोई ग़ज़लें ले हजारों घर में ही बैठा मगर,
चार कवितायें लिये वह देश भर में छा रहे।
०००
द्वेष-नफ़रत में सने जो पग से लेकर सिर तलक,
प्रेम के वो गीत मंचों पर खड़े हो गा रहे।
०००
काम जिनका चलता न था अपने यारों के बिना,
आज वो ही दोस्तों को बस धता दिखला रहे।
०००
हमने चाहा जिनको हरदम बन्धु अब उनके लिये,
फूटी आँखों भी नहीं हम जाने क्योंकर भा रहे।
०००
उँगलियाँ अपनी पकड़कर जो 'सरस' चलते रहे,
आज वो ही बेधड़क हमको दिशा बतला रहे।
*सतीश तिवारी 'सरस',नरसिंहपुर

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