बस एक ही भूख

DESH RAJ

रचनाकार- DESH RAJ

विधा- कविता

जिंदगी की राह में चलते-चलते आज मायूस हो गए,
माया की दुनिया में लक्ष्य से हटने पर मजबूर हो गए I

कभी अरमान था कि एक महकता गुलिस्ताँ बनाऊंगा,
“इंसानियत” के फूलों से इस बगिया को खूब सजाऊंगा ,
“ईमान” की क्यारी इसमें लगाकर फूलों को महकाऊंगा,
“प्रेम-प्यार” की कलियों से इस गुलशन को खिलाऊंगा I

जिंदगी की राह में चलते-चलते आज मायूस हो गए,
माया की दुनिया में लक्ष्य से हटने पर मजबूर हो गए I

भूख के रंग
*********

चौतरफा हमें दिखाई देती है, बस एक भूख ही भूख ,
सब कुछ लुटाकर सब कुछ हासिल करने की भूख,
अपने जिस्म को बेचकर दौलत पाने की एक भूख ,
टुकड़े–2 रोटी के लिए तड़पते हुए बच्चे की एक भूख,

जिंदगी की राह में चलते-चलते आज मायूस हो गए,
आगे-2 बढनें की चाहत में अपना लक्ष्य भी भूल गए,

एक हक़ीकत :

इस प्यारे जगमग जग में हम कहाँ दौड़ते चले जा रहे ?
सब कुछ भूलकर नफ़रत को अपने गले लगाते जा रहे,
“घर” को छोड़कर अलगाव के समंदर में समाते जा रहे,
लौटना है मुश्किल, ऐसे भँवर के जाल में फंसते जा रहे I

जिंदगी की राह में चलते-चलते आज हम मायूस हो गए,
माया की नगरी में प्रेम का दीपक भी जलाना भूल गए,

जिंदगी की राह में चलते-चलते आज मायूस हो गए,
माया की दुनिया में लक्ष्य से हटने पर मजबूर हो गए I

कभी अरमान था कि एक महकता गुलिस्ताँ बनाऊंगा,
“इंसानियत” के फूलों से इस बगिया को खूब सजाऊंगा ,
“ईमान” की क्यारी इसमें लगाकर फूलों को महकाऊंगा,
“प्रेम-प्यार” की कलियों से इस गुलशन को खिलाऊंगा I

जिंदगी की राह में चलते-चलते आज मायूस हो गए,
माया की दुनिया में लक्ष्य से हटने पर मजबूर हो गए I

भूख के रंग
*********

चौतरफा हमें दिखाई देती है, बस एक भूख ही भूख ,
सब कुछ लुटाकर सब कुछ हासिल करने की भूख,
अपने जिस्म को बेचकर दौलत पाने की एक भूख ,
टुकड़े–2 रोटी के लिए तड़पते हुए बच्चे की एक भूख,

जिंदगी की राह में चलते-चलते आज मायूस हो गए,
आगे-2 बढनें की चाहत में अपना लक्ष्य भी भूल गए,

एक हक़ीकत :

इस प्यारे जगमग जग में हम कहाँ दौड़ते चले जा रहे ?
सब कुछ भूलकर नफ़रत को अपने गले लगाते जा रहे,
“घर” को छोड़कर अलगाव के समंदर में समाते जा रहे,
लौटना है मुश्किल, ऐसे भँवर के जाल में फंसते जा रहे I

जिंदगी की राह में चलते-चलते आज हम मायूस हो गए,
माया की नगरी में प्रेम का दीपक भी जलाना भूल गए,

काश ! “राज” मायानगरी को पहले ही अगर जान जाता ,
“प्रेम की डगर” पर चलने का अडिग बीड़ा कभी न उठाता,
मुट्ठी बांधकर आया था, गठरी में सिमट कर चला जाता,
“भारत हमारा है” “हम भारतीय है” का अलख न जलाता I

जिंदगी की राह में चलते-चलते आज हम बेबस – मायूस हो गए,
“गुलशन” में लगी नफ़रत की आग देखने को मजबूर हो गए,

***************
देशराज “राज”
कानपुर

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