बसे हो दिल में

Sushant Verma

रचनाकार- Sushant Verma

विधा- गज़ल/गीतिका

कितना कुछ कहना रहता है
लब तक आ ठहरा रहता है

कह कर तुमको खो न दें हम
हरदम ये खटका रहता है

तुम मिल जाओ ये हो वो हो
ख़्वाब कोई पलता रहता है

कभी तो समझोगे तुम हालत
सोच के दिल बहला रहता है

दिन कट जाता जैसे तैसे
रात ज़ख़म गहरा रहता है

आन बसे हो दिल में जबसे
दिल हरदम खोया रहता है

चाँद से कैसे तुलना कर दूँ
उस पर तो धब्बा रहता है

बैठ गए जो पहलू तेरे
चाँद सदा जलता रहता है

आ जाते हो ख़्वाबों में जो
मेरा दिन महका रहता है

भीड़ भरी हो दुनिया में पर
तुम बिन सब सूना रहता है

नींद कहाँ से आये तेरी
यादों का पहरा रहता है

इक इक पल ज्यों सदियों Bजैसा
तुम बिन जो गुज़रा रहता है

तुमसे अलग जो लिखना चाहूँ
हर पन्ना सादा रहता है

सुशान्त वर्मा

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