बसेरा

jyoti rani

रचनाकार- jyoti rani

विधा- लघु कथा

मुझे यहाँ पर नौकरी ज्वाइन किये हुए अभी छ: महीने बीते थे,| मेरे ऑफिस में करीब १५-२० महिलाये काम करती थीं उनमें से एक थीं सुजाता जी जोकि मेरे ही विभाग में पोस्टेड थीं, अक्सर उनसे काम के अलावा व्यक्तिगत बातें भी होतीं रहतीं थीं | वे स्वभाव से बहुत ही सौम्य तथा गंभीर थीं , उम्र में मुझसे करीब १०-१२ वर्ष बड़ी थीं | मैं भी वरिष्ठ होने की वज़ह से उनका सम्मान तथा ख़ास ख्याल रखती थी , उन्होंने विवाह नहीं किया था | एक दिन मैंने उनसे घनिष्टता होने के बाद विवाह न करने का कारण पूछ ही लिया , तब उन्होंने बताया कि मेरे पिता जब मैं अभी पढ़ ही रही थी तब गुज़र गए थे , मेरी तीन छोटी बहनें और एक सबसे छोटा भाई है पिताजी के जाने की बाद पूरे घर की जिम्मेदारी माताजी पर आ पड़ी , मेरी माँ बहुत अधिक पढ़ी लिखी नहीं थीं बस छोटे बच्चों को घर पर ही पढ़ाकर जो थोडा बहुत कमा लेतीं थीं उससे ही गुज़ारा होता था , जैसे तैसे घर की गाडी रेंगती रही | मैं तब बी.ए. कर रही थी साथ ही साथ कंप्यूटर कोर्स भी किया था , आगे न पढ़ पाई और नौकरी की तलाश करने लगी और एक दिन मुझे यहाँ नौकरी मिल गयी , अब मैंने अपनी सभी बहनों तथा छोटे भाई को पढ़ा लिखाकर उनका विवाह कर दिया है और अब मैं अपनी माँ की देखभाल करती हूँ, इसलिए मैंने विवाह नहीं किया | मेरे यह पूछने पर कि क्या अब आप अपना घर नहीं बसा सकतीं , अभी आपकी उम्र इतनी कहाँ है , क्या सारा जीवन ऐसे ही काट देंगी , इस पर उनकी आँखों से आंसू बहने लगे और तब उन्होंने बताया कि मेरी माँ ही अब नहीं चाहतीं कि मैं उनको छोड़कर जाऊं और कोई अब तक ऐसा नहीं मिला जो मुझे मेरी माँ के साथ अपनाए , बहुत प्रयास किये लेकिन कोई ऐसा नहीं मिला और अब तो मेरा अपना भी मन नहीं चाहता | उनके इतना बताने पर मैंने उनसे कहा कि आप अखबार में इश्तिहार दीजिये , कोई न कोई तो ऐसा होगा जो विवाह के लिए राज़ी होगा | में उनको यह सलाह देकर घर आने के लिए निकल पड़ी | ऑफिस से घर आने के लिए में बस में बैठी कि माँ द्वारा कहे गए कई वर्ष पुराने शब्द याद आ रहे थे जब मैंने भी पिताजी के चले जाने के बाद उनसे अपनी इच्छा ज़ाहिर की थी की माँ मैं अभी विवाह नहीं करूंगी , मैं अपनी बहनों को पढ़ा लिखाकर उनको सेटल करूंगी तब अपना विवाह करूंगी पर माँ इसके लिए राज़ी नहीं हुईं उन्होंने कहा कि " तुम्हारा यदि मैंने विवाह समय पर न किया तो तुम शायद सदा के लिए अविवाहित रह जाओगी, हमें तुम पर निर्भर रहने की आदत हो जायेगी और ज़रा यह भी सोचो तुम्हारे पति के रूप में मुझे एक बेटा भी तो मिल सकता है , और फिर घर में एक पुरूष सदस्य भी तो आ जायेगा, हमारा परिवार पूर्ण हो जाएगा " उनकी यह बात एकदम सही साबित हुई , आज इनका मेरे परिवार में बेटे का ही तो स्थान है , माँ इनको मुझसे भी अधिक स्नेह देती हैं और खुश दिखाई पड़ती हैं , उनको खुश देखकर मुझे बहुत संतोष होता है , बहुत गर्व होता है माँ की दूरदर्शिता के ऊपर , आज मैं भी अपने दोनों बच्चों के साथ बहुत खुश हूँ , यदि माँ उस दिन यह न समझातीं तो शायद मैं भी सुजाता जी की तरह ही एकाकी होती, मेरा अपना बसेरा नहीं होता |

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