बसा परदेश में आकर अकेला छोड़कर माँ को

विवेक आस्तिक

रचनाकार- विवेक आस्तिक

विधा- मुक्तक

(1)-दहल जाता हृदय हरपल करारी पीर देती है ।
उदासी मुख पे ' छा जाती नयन भर नीर देती है ।
बसा परदेश में आकर अकेला छोड़कर माँ को,
सताती याद जब उसकी कलेजा चीर देती है ।
—'———-
(2)-
पिता माता के ' चरणों में सदा मैं सिर झुकाता हूँ ।
शिवाले, मस्जिदें, गिरिजा सभी को भूल जाता हूँ ।
बना घर एक मन्दिर है जहाँ बसते मेरे भगवन,
नहीं जाता कभी तीरथ सुमन घर में चढ़ाता हूँ ।
– – – – – –
(3)-
सुनहरा कल मिलेगा आस इसकी टूट जाती है ।
अभागिन सौत सी होती, ये ' किस्मत फूट जाती है ।
जरा जाकर के ' पूछो तो गुजरता दिल पे ' क्या उनके,
कि जिनकी पेट की खातिर पढ़ाई छूट जाती है ।
– – – – – – – –
(4)-
किसी पावन मुहब्बत का छिपाया राज जिंदा है ।
कि गोकुल के कन्हैया का तराना साज जिंदा है ।
भले कितना भी बदला हो जमाना तोड़कर रश्में,
मगर अम्मा की ' लोरी का वही रीवाज जिंदा है ।
-'———-
(5)-
यहाँ कुछ लोग मिलते हैं मे'रा दिल तोड़ देते हैं ।
भरी ख्वाबों की ' गागर को ये ' पल में फोड़ देते हैं ।
नहीं देते कभी लगने मुहब्बत को किनारे से,
चढ़ाकर नाव पर मुझको भँवर में छोड़ देते हैं ।
– – @विवेक आस्तिक – – – –

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विवेक आस्तिक
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विवेक आस्तिक, पिता का नाम - श्री राम आसरे शर्मा, पता -शाहजहांपुर ( उ.प्र ) सम्पर्क -9958017216 प्राप्त सम्मान/पुरस्कार - कादम्बिनी राष्ट्रीय हिन्दी मासिक पत्रिका का युवा रचनाकार प्रोत्साहन सम्मान - दिसम्बर ( 2013)। मुक्तक पुष्प , मुक्तक सम्राट व शीर्षक शिरोमणि सम्मान । युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच नई दिल्ली का श्रेष्ठ रचनाकार सम्मान व सारस्वत सम्मान। कवि सम्मेलन दिल्ली में दिव्यमान स्मृति सम्मान 2016 । नई दिल्ली में श्री बालकृष्ण शर्मा ' बालेन्दु पुरस्कार 2016

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