“बदलाव व्यक्तित्व और समाज”

Mahender Singh

रचनाकार- Mahender Singh

विधा- कविता

बदलाव में पीड़ा तो बहुत है,
बेहतर है …फिर भी बदले,

वैसे भी तो बहुत कुछ रहेगा ऐसा,
जो बदल सके ना शिक्षा और चौपाई,

लिखे गए जो जन्म से भी पहले,
वो बदल सके ना ..धर्म हो या परछाई,

कर्मों से बनते और बदलते भाग्य हैं,
बदल ना पाओगे वर्ण-व्यवस्था का अटूट धागा,

फिर कहाँ बदलने में सार है,
ऐसा नहीं है ..डॉ महेंद्र खालेटिया,

No extension to such matters.
which breeds frustration 😊

कुछ लोगों से उलझने का नाम नहीं है,
जिंदगी !
अपने सेवा-भाव में बढ़ोतरी करो,

यही मानुष-जन्म सार है,
घर घर ….दीप जले,
जग में "जीव-जीवन" में प्रेम हो,
"परमार्थ" .. "परम-सुखाय"
बहुजन हिताय…बहुजन सुखाय,

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Mahender Singh
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पेशे से चिकित्सक,B.A.M.S(आयुर्वेदाचार्य)

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