** बदलते रिश्ते … **

Neelam Ji

रचनाकार- Neelam Ji

विधा- कविता

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अपने तो हैं अपनापन नहीं ,
भाई तो है भाईचारा नहीं ।
रहा कोई किसी का सगा नहीं ,
रिश्ते तो हैं पर वफ़ा नहीं ।।

स्वार्थ से भरी इस दुनिया में ,
अपनों को अपनों से प्यार नहीं ।
खून के रिश्ते भी हुए पराए ,
रहा खून पर अब ऐतबार नहीं ।।

बदलते रिश्ते बदलते ढंग ,
जाने कब कौन दिखाए कैसा रंग ।
मतलब के रह गए सब रिश्ते हैं ,
चलते नहीं अपने अब मुश्किल में संग ।।

बात ख़ुशी की हो तो गैर भी साथ हो लेते हैं ,
आए जो संकट तो अपने भी मुँह मोड़ लेते हैं ।
भेद खुलता है अपने-पराये का मुश्किल में ही ,
जो संकट में छोड़ दें वो रिश्ते सिर्फ नाम के होते हैं ।।
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Neelam Ji
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मकसद है मेरा कुछ कर गुजर जाना । मंजिल मिलेगी कब ये मैंने नहीं जाना ।। तब तक अपने ना सही ... । दुनिया के ही कुछ काम आना ।।

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