बता क्यूँ नहीं देते…..

शालिनी साहू

रचनाकार- शालिनी साहू

विधा- गज़ल/गीतिका

एक बार ही जी भर के सजा क्यूँ नहीं देते
इन रूढ़ियों, परम्पराओं को मिटा क्यूँ नहीं देते!
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जन्म से ही पाप समझी जाती हैं बेटियाँ
इन गलतफहमियों को सुलझा क्यूँ नहीं देते!
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मार दी जाती है दुनियाँ में कदम रखने से पहले
ऐसे भेदभाव को मिटा क्यूँ नहीं देते!
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होती हैं लाख बंदिशे दोनों घरों में
इन बंदिशों को कुछ कम कर क्यूँ नहीं देते!
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धन, ऐश्वर्य रूप-सौन्दर्य सब चाहिए
ऐसे सौदागरों को भगा क्यूँ नहीं देते!
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हर रोज शिकार होती हैं तेजाब के हमलों का
उन दरिन्दों को जला क्यूँ नहीं देते!
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चलती राहों में सरेआम होती है इज्जत उनकी
तुम अपनी आँखों से चश्मा हटा क्यूँ नहीं देते!
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माना परिधान हैं छोटे उनके
अपनी नजर में बहन बना क्यूँ नहीं देते!
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आरोप लगते हैं अधकटे कपड़ों के
बचपन की यादों को हवा क्यूँ नहीं देते!
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बहन को कैद चलती राहों को मॉल या आइटम
इस गन्दगी को जिश्मऔर जान से निकाल क्यूँ नहीं देते!
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प्रयास थोड़ा सा ही करके
अपनी राखी का फर्ज अदा कर क्यूँ नहीं देते!
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बार-बार अपमानित करते हो उन्हें
एक बार उनकी गलती बता क्यूँ नहीं देते!
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शालिनी साहू
ऊँचाहार, रायबरेली(उ0प्र0)

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