बच्चो को रोटी

vinay pandey

रचनाकार- vinay pandey

विधा- कविता

*___________बच्चो को रोटी___________*
भाला चुभा हुआ सीने मे पीडा़ असहय हुई है
फिर भी भाग दौड़कर जुटा रहा हूं मै बच्चो को रोटी !
मॉ पिता पत्नी के चेहरे आग जलाये ताकत देते
धुटने टेक नही सकता हूँ जिन्दा जब तक बोटी !
अकडी़ हुई ठण्ड से धरती जमने लगा खून देह का
बिस्तर पर मै बर्फ हुआ हूँ !
डाल चटाई सूरज सोया सांसो मे भीतर है गर्मी
अंगारों का हर्फ हुआ हूँ !
वैध्ध हकींमो की सलाह से परहेंजो को धोती जैसे
पहन पहन कर फाडा़ भी है जीवन दिया लँगोटी !
तेज धूप वर्षा की टप टच धोड़े की दुलत्ती जैसे
नंगे सिर पर झेल रहा हूं !
एक हौसला बडी दवा है ऐसी ताकत नही किसी मे
आसमान को छुआ जभी से दुनियॉ लगती छोटी !
धुटने टेक नही सकता हूँ जिन्दा जब तक बोटी !!

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vinay pandey
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