बचा सको तो बचा लो तुम प्रकृति की काया

कृष्ण मलिक अम्बाला

रचनाकार- कृष्ण मलिक अम्बाला

विधा- कविता

😢
लिखने को हुई जो कलम तैयार
तुम भी करना जरा सोच विचार
करते हो अगर प्रकृति से प्यार
बातें सुन लो तुम मेरी चार
जल की महिमा है अनन्त अपार
व्यर्थ गंवा न कर अत्याचार
पुश्तों को दे बूंदों की बौछार
अगर करे तू जो सोच विचार
कार पूल से बचा हवा की गंदगी
पानी प्यासे को पिला कर बचा लाखों जिंदगी
लगा पेड़ हजारों में
चमकेगा नाम तेरा सितारों में
छत पर पिला पंछियों को पानी
सही से काम आये तेरी जिंदगानी
दे दो प्रकृति को जीवन का किराया
बचा सको तो बचा लो प्रकृति की काया

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कृष्ण मलिक अम्बाला
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कृष्ण मलिक अम्बाला हरियाणा एवं कवि एवं शायर एवं भावी लेखक आनंदित एवं जागृत करने में प्रयासरत | 14 वर्ष की उम्र से ही लेखन का कार्य शुरू कर दिया | बचपन में हिंदी की अध्यापिका के ये कहने पर कि तुम भी कवि बन सकते हो , कविताओं के मैदान में कूद गये | अब तक आनन्द रस एवं जन जागृति की लगभग 200 रचनाएँ रच डाली हैं | पेशे से अध्यापक एवं ऑटोमोबाइल इंजिनियर हैं |

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3 comments
  1. कृष्ण मलिक जी अच्छी रचना जो एक सरल भाषा के प्रयोग साथ _साथ सन्देश भी देती/एकसूत्र शब्दो का समन्वय जो शुरूआत से अन्त तक एकरूपता