* बचपन *

भूरचन्द जयपाल

रचनाकार- भूरचन्द जयपाल

विधा- कविता

गांव बचपन का भला या
गांव का बचपन भला
कौन जाने कब -कब
किसी ने किसको
नहीं *** छला

खेलते थे जब उछलकर
पेड़ की डाली से हम
बन्दरों को भी दे जाते थे
मात जब कूदे डाली से हम
चहचहाते थे हम सब
चिड़ियों के बच्चों से हम
एक कोलाहल सा मचा
होता था पूरे गांव में
डर का , ना था , कोई ठिकाना
ना दिल में, ना मेरे पांव में
साथियों से पाकर सह और
बढ़ जाती थी मेरी उमंग
तंग आ जाते थे घर और
घर के बाहर वाले सब
लौट आते तो आखिर
आ जाते उनकी जां में दम
बचपन में हम भी नही थे
शायद किसी से कम
कहकहा लगा के हंसते
चहचहाते भी थे हम
आज फिर याद आ गया
मुझको मेरा पराया सा बचपन
भूल ना पायेंगे चाहे हों ले अब पचपन के हम ।।
👍मधुप बैरागी

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भूरचन्द जयपाल
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मैं भूरचन्द जयपाल सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि में विशेष रूचि, हिंदी, राजस्थानी एवं उर्दू मिश्रित हिन्दी तथा अन्य भाषा के शब्द संयोग से सृजित हिंदी रचनाएं 9928752150

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