बचपन

राजेश शर्मा

रचनाकार- राजेश शर्मा

विधा- कविता

बचपन में बचपन खोना कौन चाहता है?कुछ बच्चों को रोज़ देखता हूँ ;मेहनत करके कमाते हुये बच्चे
अच्छे नहीं लगते?स्कूल जाने और खेलने खाने की
उम्र में ये सब करना———?

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"बचपन"
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बचपन में बचपन
खो जाना
कैसा लगता है?

बचपन का गलियों
गुम हो जाना
कैसा लगता है?

बचपन का यूँ
धूल फाँकना
कैसा लगता है?

बचपन को यह
बोझ उठाना
कैसा लगता है?

बचपन का यूँ
कूड़ा बीनना
कैसा लगता है?

बचपन का
मुश्किल हो जाना
कैसा लगता है?

बचपन में यूँ
आँसू बहाना
कैसा लगता है?

बचपन ही बचपन
में सूनापन
कैसा लगता है?

बात बात पर
बचपन का गाली
हो जाना
कैसा लगता है?

बचपन का
क़तरा क़तरा
हो जाना
कैसा लगता है?
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राजेश"ललित"शर्मा

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राजेश शर्मा
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मैंने हिंदी को अपनी माँ की वजह से अपनाया,वह हिंदी अध्यापिका थीं।हिंदी साहित्य के प्रति उनकी रुचि ने मुझे प्रेरणा दी।मैंने लगभग सभी विश्व के और भारत के मूर्धन्य साहित्यकारों को पढ़ा और अचानक ही एक दिन भाव उमड़े और कच्ची उम्र की कविता निकली।वह सिलसिला आज तक अनवरत चल रहा है।कुछ समय के लिये थोड़ा धीमा हुआ पर रुका नहीं।अब सक्रिय हूँ ,नियमित रुप से लिख रहा हूँ।जब तक मन में भाव नहीं उमड़ते और मथे नहीं जाते तब तक मैं उन्हें शब्द नहीं दे पाता। लेखन :- राजेश"ललित"शर्मा रचनाधर्म:-पाँचजन्य में प्रकाशित "लाशों के ढेर पर"।"माटी की महक" काव्य संग्रह में प्रकाशित।
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