फूस का आराम देता मेरा घर अच्छा लगा

Pritam Rathaur

रचनाकार- Pritam Rathaur

विधा- गज़ल/गीतिका

साथ चलने वाला मेरा हमसफ़र अच्छा लगा
राह में काँटे मिलें या गुल मगर अच्छा लगा

उसने माँगी थीं दुआएँ जो कभी मेरे लिए
उन दुआओं का हुआ है अब असर अच्छा लगा

खो गया था दिल मेरा जिसके नज़रे-झील में
डूब कर हम रह गये थे वो भँवर अच्छा लगा

वो जहाँ पर घर बना था मेरे उस महबूब का
सच कहूँ तो संग था पर वो शहर अच्छा लगा

इक नज़र देखा जो उसने और सीने में ये दिल
हो गया घायल हमारा ये जिग़र अच्छा लगा

गर्मियों की चिलचिलाती धूप में चलकर मुझे
फूस का आराम देता मेरा घर अच्छा लगा

घूम कर सारे जहां को देख मैंने है लिया
रहते हैं अहबाब मेरे वो नगर अच्छा लगा

है सिखाया इस जहां को अदब-ओ-तहज़ीब-ओ-सबक
आज मुझको उस नबी का पाक दर अच्छा लगा

हो गये दीवाने तेरे देखकर ज़ल्वा तेरा
मुझको "प्रीतम" तेरे जैसा ज़ल्वाग़र अच्छा लगा

प्रीतम राठौर भिनगाई
श्रावस्ती (उ०प्र०)
नवंबर 2016

Sponsored
Views 2
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
Pritam Rathaur
Posts 168
Total Views 1.7k
मैं रामस्वरूप राठौर "प्रीतम" S/o श्री हरीराम निवासी मो०- तिलकनगर पो०- भिनगा जनपद-श्रावस्ती। गीत कविता ग़ज़ल आदि का लेखक । मुख्य कार्य :- Direction, management & Princpalship of जय गुरूदेव आरती विद्या मन्दिर रेहली । मानव धर्म सर्वोच्च धर्म है मानवता की सेवा सबसे बड़ी सेवा है। सर्वोच्च पूजा जीवों से प्रेम करना ।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia