फुटाने

avadhoot rathore

रचनाकार- avadhoot rathore

विधा- लघु कथा

आठ से दस वर्षीय तीन बालक एक किराना दुकान पहुंचे।दूकानदार वृद्ध था।
" क्या लेना है ? "
" दो रूपये के फुटाने ।"
दूकानदार ने कोने में टिकी सीढ़ी निकाली।उसे एक जगह लगा हाँफते हुए ऊपर चढ़ा । एक डिब्बा पकड़ धीरे -धीरे नीचे उतरा। दो रूपये के फुटाने पहले बालक को दिये। डिब्बा पकड़ धीरे धीरे ऊपर सीढ़ी से चढ़ा ।
हांफता नीचे उतरा। सीढ़ी जहां की तहाँ रख पहले बालक से दो रूपये ले संदूक में डाले ।
" तुझे क्या लेना है ?"दूसरे से पूछा।
" दो रुपये के फुटाने,।"दूसरा बोला।
" पहले बोलना था न ।"
" मुझसे पूछा कहाँ,,।" दूसरा बोला।
दूकानदार ने डिब्बा निकालने की पहली
जैसे मशक्कत की। फुटाने दूसरे बालक को देकर पैसे लेकर संदूक में रखे ।
अपनी मशक्कत देख डिब्बे और सीढ़ी यथास्थान रखने से पूर्व अपनी बुद्धि का उपयोग किया।वरना फिर उतनी ही,,,
" तुझे तो दो रुपये के फुटाने नहीं
लेना है ?"
" नहीं,,।" तीसरा बोला।
दूकानदार डिब्बा पकड़े ऊपर चढ़ते बड़बड़ा रहा था,," इसीलिए पहले पूछ लिया,,।"
वृद्ध दूकानदार हांफता नीचे उतरा।सीढ़ी यथास्थान रखी।तीसरे से मुखातिब हुआ,,।
" तुझे क्या लेना है? "
"फुटाने,,।"
" तभी नहीं क्यों कहा था ,?"
" तुमने पूछा था,,दो रुपये के इसलिए मैंने मना किया था ।मुझे दो नहीं चार रुपयों के लेने हैं। "
दूकानदार ने चिल्लाना चाहा ।पर ऐसा न कर सका ।दूकानदारी के उसूलों को तिलांजली कैसे देता।
उतनी ही मशक्कत की । नन्हे ग्राहक देव को सामान देकर विदा किया। यद्यपि उसका अंतर बहुत दुखी हो गया था।

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