फिर तल्ख़ियों का लुक़्मा निगलना पड़ा मुझे

Pritam Rathaur

रचनाकार- Pritam Rathaur

विधा- गज़ल/गीतिका

ग़ज़ल
———-

221 2121 1221 212
मतला

माँ बाप से बिछड़ के सँभलना पड़ा मुझे
इस जिंदगी को ऐसे बदलना पड़ा मुझे
🍂🌿🌴🍀🍁🌷💐🌺🌹
किस्मत भी रो पड़ी थी मेरी देख कर यही
जब आज़ गर्दिशों में भी पलना पड़ा मुझे
🌹🌺💐🌷🍁🌴🍀🌿🍂
हमको तलाशे-यार में मंजिल नही मिली
शबो रोज़ फ़ुर्क़तों में ही जलना पड़ा मुझे
🍂🌿🌴🍀🍁🌷💐🌺🌹
मिलते नहीं जुबां में निवाले शहद भरे
फिर तल्ख़ियों का लुक्मा निगलना पड़ा मुझे
🍂🌿🌴🍀🌷🌷🍁🌺🌹
उस बेवफ़ा के जैसे न पत्थर मैं बन सका
बस मोम की तरह से पिघलना पड़ा मुझे
🌴🍀🍂🌿🌷💐🌺🌹🌺
छू लेंगे चाँद हम भी तो सोचा था ये मगर
बस दूर से ही देख बहलना पड़ा मुझे
🍂🌿🌴🍀🍁🌷🌺🌹🌷
अपनों ने दिल पे जख़्म दिए हमको इस तरह
कूचे से फिर तो उनके निकलना पड़ा मुझे
🍂🌿🌴🍀🍁🌷💐🌺🌹
"प्रीतम" जो जल चुकी है हसरतों की लाश जो
माथे पे अपने राख़ को मलना पड़ा मुझे
🌿🌴🍀🍂🍁🌷💐🌺🌹
प्रीतम राठौर भिनगाई
श्रावस्ती (उ०प्र०)

Views 5
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
Pritam Rathaur
Posts 123
Total Views 918
मैं रामस्वरूप राठौर "प्रीतम" S/o श्री हरीराम निवासी मो०- तिलकनगर पो०- भिनगा जनपद-श्रावस्ती। गीत कविता ग़ज़ल आदि का लेखक । मुख्य कार्य :- Direction, management & Princpalship of जय गुरूदेव आरती विद्या मन्दिर रेहली । मानव धर्म सर्वोच्च धर्म है मानवता की सेवा सबसे बड़ी सेवा है। सर्वोच्च पूजा जीवों से प्रेम करना ।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia