….फिर चले आओ पिता………

Dayal yogi

रचनाकार- Dayal yogi

विधा- गज़ल/गीतिका

रात फिर काली है आज
भय भगा जाओ पिता
छाती पर अपनी लिटाकर
फिर सुला जाओ पिता

देख लो मै इन अँधेरों से
अकेला लड़ रहा हूँ
आपकी दिखलाई राहों
पर निरन्तर बढ़ रहा हूँ

फिर क्युँ विचलित मन हुआ है
आओ समझाओ पिता

लाखों की है भीड़ पर
तुम बिन मैं तन्हा हूँ बहुत
थामने दो अँगुली अपनी
भटका भटका हूँ बहुत

या फिर मेरा हाथ पकड़ कर
मंजिल तक पहुँचाओ पिता

अब कहाँ से लाँऊ वो
जादू के जैसा बूढ़ा हाथ
हर चिन्ता को हरने वाला
हर दौलत से महँगा हाथ

मौत को जीवन बना दो
फिर चले आओ पिता

छाती पर अपनी लिटाकर
फिर सुला जाओ पिता

बेहतरीन साहित्यिक पुस्तकें सिर्फ आपके लिए- यहाँ क्लिक करें

Views 2
इस पेज का लिंक-
Sponsored
Recommended
Author
Dayal yogi
Posts 8
Total Views 33

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia