“फासला”

रजनी मलिक

रचनाकार- रजनी मलिक

विधा- गज़ल/गीतिका

"अहसास वो अधूरा जताना जरुर था।
हम बस तुम्ही से है बताना जरुर था।
ठोकर पे इक बदल गए जज्बात कैसे सब,
ताउम्र चाहतों को निभाना जरुर था।
तन्हा अकेले मोड़ पे मुँह फेरना तेरा,
परदा कभी नज़र का उठाना जरुर था ।
तय वक़्त ने किया जो दरम्यां तेरे मेरे,
उस गमजदा सफर का फासला मिटाना जरुर था।
नासमझ कितनी हसरतें जो जार जार थी,
उनको भी जिंदगी से मिलाना जरुर था।
…..रजनी……..

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रजनी मलिक
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योग्यता-M.sc (maths) संगीत;लेखन, साहित्य में विशेष रूचि "मुझे उन शब्दों की तलाश है;जो सिर्फ मेरे हो।"
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2 comments
  1. बहुत सुन्दर ग़ज़ल है । मतले को सबसे ऊपर लिख लीजिये ।