प्रेम की किताब

DESH RAJ

रचनाकार- DESH RAJ

विधा- कविता

मन–मंदिर में एक दिन मेरी नज़र एक किताब पर पड़ गई ,
इस अनोखी किताब को पढ़कर मेरी तक़दीर ही बदल गई ,
“जग के मालिक” के प्यार की दौलत मेरी झोली में भर गई ,
मेरी वीरान बगिया “ प्रेम के फूलों ” की खुशबू से महक गई ,
“जग के मालिक ” के कदमों में गुनाहगार की अर्जी लग गई I

अनमोल किताब को पढ़कर अब इस जग में कुछ भी छुपा न रहा ,
इस किताब को जिसने भी पढ़ा प्रेम की डगर पर बढ़ता ही गया ,
संकुचित न रह कर वो परमपिता की रोशनी में खूब निखरता रहा ,
“जग के मालिक” के कार्यों को करके उसने मजलूमों को रास्ता दिया ,
“मेरा भारत महान ” के सच्चे सपूत होने का उसने पुख्ता सबूत दिया I

संत-महापुरुषों ने किताब को पढ़कर प्यार का रास्ता दिखाया ,
इंसानियत की पगडंडियों पर चलने का हमें इसका महत्व बताया ,
लेकिन उनको दरकिनार कर हमने झूठ – फ़रेब का मार्ग बनाया ,
खूबसूरत “ चमन ” में कफ़न का कारोबार हरतरफ बेहिसाब बढ़ाया ,
नफरत की दीवारों के मध्य हमने आलीशान घरौंदा उसमें सजाया I

“जहाँ ” में इंसानियत को दफ़न कर वो किताब का नाम पूछ रहे ,
किताब को तार-2 करके वो किताब के रचयिता का नाम पूछ रहे ,
जगमगाते जग में “ जग के पालनहार ” से प्यार का हिसाब पूछ रहे ,
प्रेम की किताब किनारे करके वो घ्रणा- नफरत का सामान बेच रहे ,
बेसहारों की सिसकियों में अपनी खुशियों का एक संसार खोज रहे ,

“राज” को इस जगमग जग में आया है अब ज्ञान ,
जग के मालिक ने लिखी है यह प्रेम की किताब,
महापुरुषों ने अपने जीवन में इसे उतारा बेहिसाब ,
हम भी इसे अपने जीवन में ढालकर बनें बेमिसाल ,
ह्रदय में विराजे प्रेम की किताब फिर निकले मेरी जान I

***
देशराज “राज”
कानपुर

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