प्रिये ! मैं गाता रहूंगा…

त्रिलोक सिंह ठकुरेला

रचनाकार- त्रिलोक सिंह ठकुरेला

विधा- गीत

यदि इशारे हों तुम्हारे, प्रिये ! मैं गाता रहूंगा.
प्रेम-पथ का पथिक हूँ मैं ,
प्रेम हो साकार तुम.
मुझ अकिंचन को हमेशा ,
बांटती हो प्यार तुम.
पात्र लेकर रिक्त ,द्वारे नित्य ही आता रहूंगा.
सरस है जीवन तुम्हीं से,
हर दिवस मधुमास है.
रात का हर पल,
तुम्हारे प्रेम का ही रास है.
बेणु का हर सुर मधुरतम तुम्हीं से पाता रहूंगा.
खिलेंगे जब तक
तुम्हारे युगल नयनों में कमल.
तभी तक सुखमय रहेंगे,
ज़िन्दगी के चार पल.
मैं मधुप हर पंखुड़ी पर बैठ,मुस्काता रहूंगा.
प्रेम से जीवन मेरा,
तुमने संवारा जिस तरह.
मैं तुम्हें प्रतिदन इसका,
दे सकूंगा किस तरह.
नित्य बलिहारी तुम्हारे प्रेम पर जाता रहूंगा.
— त्रिलोक सिंह ठकुरेला

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त्रिलोक सिंह ठकुरेला
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त्रिलोक सिंह ठकुरेला कुण्डलिया छंद के सुपरिचित हस्ताक्षर हैं.कुण्डलिया छंद को नये आयाम देने में इनका अप्रतिम योगदान है.
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2 comments
  1. वह्ह्ह्ह्ह्ह्ह् आदरणीय वह्ह्ह् वाकई लाजवाब