प्रभु संदेश

Raj Vig

रचनाकार- Raj Vig

विधा- कविता

प्रभु के दरबार मे आज इंसाफ हो रहा था
दूध दूध पानी पानी हिसाब हो रहा था
किये हुए कर्मो का भुगतान हो रहा था
दूसरे को सजा मिलते देख
रूह मेरी कांप उठी
अपने कर्मो का आभास होने लगा
पश्चाताप की आग मे,
आंखों से बहता हुआ सैलाब
मेरे दोनो गालों को गीला करने लगा
मेरे चेहरे को देखकर प्रभु मुस्कराने लगे
सजा से डरता है कंयू जब गुनाह करता है तू
न जा सागर भंवर मे, फंस जायेगा चक्रव्यूह मे
मोड़ दे कशतियों का रूख किनारो की ओर
मिल जायेगी परमात्मा से तेरी आत्मा की डोर ।
स्वप्न मेरा टूट चुका था,
प्रभु संदेश मेरे कानो मे गूंज रहा था ।।

राज विग

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