प्रभु भक्ति

rekha mohan

रचनाकार- rekha mohan

विधा- कविता

प्रभु भक्ति
प्रभु भक्ति में मन कब रमता है
जीवन तो ये सोचो में चलता है|
धन कमाने के भी ढंग करता हैं ,
कुछ समय प्रभु का भी बनता हैं |
भक्त कब बुलाएगा प्रभु निष्ठां करता ,
इंसान उलझनों में उपेक्षा करता है |
तीज-त्यौहार याद दिलाते प्रभु की ,
तब हम भक्ति में लग जाती रब की |
बुद्धि खोई भ्रम मन से न जान पाए
दिनभर आस पाने में दिन ढल जाए |
चाहत शेष तो रही प्रभु की आस्था हो ,
मन से पाने का ही वास्ता रास्ता हो |
यही सोच दिन-रात अलग राह खो जावे ,
सुख में जपु प्रभु नाम दुःख क्यों कर आए|
रेखा मोहन 25/2/२०१7

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