प्रद्युम्न हम बहुत शर्मिंदा हैं

Rita Singh

रचनाकार- Rita Singh

विधा- कविता

प्रद्युम्न हम बहुत शर्मिंदा हैं
तेरे कातिल क्यों जिंदा हैं ?
माँ का आँचल कह रहा तड़पकर
क्यों मिला लाल को मौत का फंदा है ?

स्कूल तेरा कैसा ये धंधा
उसमें वहशी घूम रहे
विद्या के पावन मंदिर में
रक्त मासूम का चूस रहे ।

कैसे इस सभ्य समाज मे
अबोध निशाना बन जाते हैं
रम रहे मानव में ही दानव
जो शिकार उन्हें बना जाते हैं ।

कैसे मनुज वो कहला सकते
जो कृत्य दनुज के करते हैं
विद्या के पावन मंदिर में भी
अपराध अक्षम्य वो करते हैं ।

कहाँ शिक्षा पाएँगे बच्चे
आज प्रश्न मानवता पूछ रही
कैसे निश्चिन्त हों मात पिता
जब विद्यालय में पशुता घूम रही ।
डॉ रीता

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Rita Singh
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नाम - डॉ रीता जन्मतिथि - 20 जुलाई शिक्षा- पी एच डी (राजनीति विज्ञान) आवासीय पता - एफ -11 , फेज़ - 6 , आया नगर , नई दिल्ली- 110047 आत्मकथ्य - इस भौतिकवादी युग में मानवीय मूल्यों को सनातन बनाए रखने की कल्पना ही कलम द्वारा कुछ शब्दों की रचना को प्रेरित करती है , वही शब्द रचना मेरी कविता है । .

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