प्रतीत्यसमुत्पाद

Neeraj Chauhan

रचनाकार- Neeraj Chauhan

विधा- अन्य

आज ऐसा कोई भी इंसान नहीं, जिसको कोई दुःख ना हो। हर एक को कोई ना कोई दुःख अवश्य है। आखिर दुःख का स्वरूप क्या हैं? दुःख होता क्यों है? ईसा की पहली शताब्दी से भी पूर्व गौतम बुद्ध ने इस सवाल का समाधान खोजा। बुद्ध ने कहा " सब्बम दुखम"। अर्थात संपूर्ण संसार दुःखमय हैं। जो भी इस जगत में दिखाई देता है सभी की परिणति दुःख में होती है। अपनी इस बात को और अधिक पुष्ट करने के लिए उन्होंने एक सिद्धांत दिया जिसका नाम था – "प्रतीत्यसमुत्पाद"। प्रतीत्य = इसके होने से + समुत्पाद = यह होता हैं। अर्थात इस शब्द का शाब्दिक अर्थ हैं- इसके होने से यह होता हैं। अपने इस शब्द से बुद्ध का तात्पर्य था कि संसार की हर एक वस्तु में कार्य-कारण संबंध अवश्य होता हैं। अर्थात किसी भी वस्तु की उत्पत्ति में कोई ना कोई कारण अवश्य होता हैं। ठीक इसी प्रकार दुःखों के मूल में भी एक कारण है और वह हैं – तृष्णा। तृष्णा की वजह से ही मनुष्य समस्त दुःख भोगता हैं। तृष्णाओं का अंत नहीं हैं। एक बार मनुष्य इसके लपेटे में आ जाता हैं फिर आजीवन उसे दुःख भोगना पड़ता हैं। अतः बुद्ध ने दुखो से मुक्ति का एक ही रास्ता बताया है और वह हैं अपनी तृष्णाओं का अंत करना। अगर हमें सुख पूर्वक अपने जीवन को जीना हैं तो तृष्णा को कम करना होगा। जो मिल रहा है भगवन कृपा समझ कर उसमे संतुष्ट रहना होगा। बुद्ध ने माना कि तृष्णाओं का अंत इतना आसान नही हैं। इसलिए उन्होंने इंसानों को मध्यम मार्ग का सुझाव दिया। यही प्रतीत्यसमुत्पाद हैं । और आज के भौतिकवादी मनुष्य को इसे समझना चाहिए।

– नीरज चौहान

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Neeraj Chauhan
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कॉर्पोरेट और हिंदी की जगज़ाहिर लड़ाई में एक छुपा हुआ लेखक हूँ। माँ हिंदी के प्रति मेरी गहरी निष्ठा हैं। जिसे आजीवन मैं निभाना चाहता हूँ।

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