पेड़ों की पुकार

Kaushlendra Singh Lodhi

रचनाकार- Kaushlendra Singh Lodhi

विधा- अन्य

वृक्ष कहते हमें तुम मत काटो,
हमे काटना अपने आप को काटना है I
हमे उजाड़ कर, अपना घर बसाना.
घर बसाना नहीं ये उजाड़ना है II
.
देश की आजादी के बाद भी,
हो रही वनों की निर्मम कटाई I
जिसके कारण फ़ैल रहा है प्रदूषण,
शहर-शहर और गाँव-गाँव की इकाईII
.
अगर चाहते हो देश की उन्नति अपनी प्रगति,
तो हमारी रक्षा करो I
वृक्षारोपण करो, प्रकृति के साथ चलो;
देश के लिये कुछ काम करो II
.
वृक्षों से पर्यावरण होता है संतुलित,
वृक्षों के बिना अनावृष्टि व तूफान है I
वनों के अभाव में बढ़ती है गर्मी,
बढ़ता है प्रदुषण और नष्ट होती ओजोन है II
.
ऐ धरती के सपूतो,
सुन लो हमारी गुहार I
अगर चाहते हो अपना उद्धार;
करना होगा अपनी आदत में सुधार II
.
ऐ मानव अगर तूमने नहीं सुना,
तो तुम्हारा भी होगा एक दिन विनाश I
जैसे हमारा हो रहा है,
तुम भी छोड़ोगे जीवन की आश II
.
जन्म से मृत्यु तक तुम्हारी,
प्रत्येक आवश्यकताएं करते हम पूरी I
हल, किवाड़, चारपाई, ईधन और,
साथ जलते हैं चिता में तुम्हारी II
.
आओ हमारे साथ मिलकर रहो तुम,
हम देंगे फूल, फल, लकड़ी और आक्सीजन I
तुम हमारी रक्षा करो, प्यार दो,
देंगे तुम्हे स्फूर्ति उत्साह मय तन-मन II

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Kaushlendra Singh Lodhi
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कौशलेन्द्र सिंह लोधी "कौशल" कवि नि. मतरी बर्मेन्द्र, तहसील-उन्चेहरा, जिला-सतना (म.प्र.) I राजस्व निरीक्षक पद पर तहसील-पलेरा, जिला-टीकमगढ़ (म.प्र.) में सेवारत I शिक्षा - बी.एस-सी.(MPG)

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