पूर्व पर पश्चिम का लिबास कैसा विरोधाभास ?

निर्मला कपिला

रचनाकार- निर्मला कपिला

विधा- कविता

कविता

पूर्व पर पश्चिम का लिबास
कैसा विरोधाभास ?
श्रद्धा हो गयी लुप्त
रह गया केवल् श्राद्ध

आभार पर हो गया
अधिकार का हक
सम्मान पर छा गया
अभिमान नाहक्
रह गया सिर्फ
मतलव का साथ
कैसा विरोधाभास
चेतना मे है सिर्फ स्वार्थ
भूल गये सब परमार्थ
रह गये रिश्ते धन दौलत तक
मैं हडप लूँ उसका हक
प्रेम प्यार सब कल की बातें
आदर्शों का हो गया ह्रास
कैसा विरोधभास
पूर्व पश्चिम जब एक हो गये
ना रही शार्म ना रहा लिबास
ना रही मर्यादा
न रिश्तों का एहसास
वेद उपनिश्द सब धूल गये
रह गया बाबाओं का जाल
ओ नासमझो
उस सभ्यता को क्यों अपनायें
जो कर दे पथ से विचलित
इसके दुश्परिणाम से
तुम क्यों नहीं परिचित
रह्ने दो पूरब पर पूरब का लिबास
जिसमे भारत की संस्कृ्ति की है सुबास

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निर्मला कपिला
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लेखन विधायें- कहानी, कविता, गज़ल, नज़्म हाईकु दोहा, लघुकथा आदि | प्रकाशन- कहानी संग्रह [वीरबहुटी], [प्रेम सेतु], काव्य संग्रह [सुबह से पहले ], शब्द माधुरी मे प्रकाशन, हाईकु संग्रह- चंदनमन मे प्रकाशित हाईकु, प्रेम सन्देश मे 5 कवितायें | प्रसारण रेडिओ विविध भरती जालन्धर से कहानी- अनन्त आकाश का प्रसारण | ब्लाग- www.veerbahuti.blogspot.in
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3 comments
  1. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी …बेह्तरीन अभिव्यक्ति