पुरानी क़िताबों से धूल झाड़ते रहना

suresh sangwan

रचनाकार- suresh sangwan

विधा- गज़ल/गीतिका

पुरानी क़िताबों से धूल झाड़ते रहना
काग़ज़ पे लिखके जज़्बात फ़ाड़ते रहना

बदलते ही रहते हैं ख़्याल ज़माने के
गर बुरा कुछ लगे तो मिट्टी डालते रहना

बिखरी है ज़माने की हवाओं से हरसू
मुसीबतों को गर्द सा बस झाड़ते रहना

मात-पिता हैं ज़मीन- औ- आसमाँ ए बंदे
हर पल तुम तैयार उनके वास्ते रहना

खिज़ाओं के मौसम बिखर न जाना कभी
ख़्वाब ज़िंदगी में नये पालते रहना

आलसी लोगों की है आदत ये मशहूर
हो काम कैसा भी कल पर टालते रहना

जिंदगानी ना मिले शायद देकर जान भी
तुम दामन हौसले का 'सरु' थामते रहना

Sponsored
Views 4
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
suresh sangwan
Posts 230
Total Views 2.9k

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia
One comment